हल्दी की खेती, Turmeric farming in India


नमस्कार किसान भाइयों आज हम हल्दी की खेती Turmeric farming के बुवाई के तरीकों और तकनीक पर बात करेंगे । हल्दी भारत में एक लोकप्रिय मसाला है। भारत में इसको पीला सोना भी कहा जाता है जो इस के सुनहरे पीले रंग के कारण है। विशेषकर भारत में हल्दी का प्रयोग व्यंजन को स्वादिष्ट बनाने के तौर पर किया जाता है। हल्दी का प्रयोग कई तरह के धार्मिक अनुष्ठानों में भी क्या जाता है इस प्रकार इसका महत्व और बढ़ जाता है।

हल्दी की खेती, Turmeric farming

हल्दी की खेती कैसे करें


सबसे पहले हमें हल्दी में से अंकुरित होने वाले हिस्सों का चयन करना होगा। हल्दी की गांठओं का चयन करने से पहले हमें यह सुनिश्चित करना होगा की वह गांठे रोग मुक्त तथा पूर्ण तरह विकसित और स्वस्थ हो।


हल्दी की खेती Turmeric farming के लिए 5 से 7 मीटर लंबी तथा 2 से 3 मीटर चौड़ी क्यारियां बनाकर उनमें 25X30 सेंटीमीटर की दूरी पर छोटे गड्ढों को खोदकर हल्दी की गांठ को को डालकर उन गड्ढों को मिट्टी व सूखे गोबर से भर देना है। अच्छी हल्दी के उत्पादन के लिए पेड़ से पेड़ की दूरी कम से कम 25 सेंटीमीटर होनी चाहिए। एक एकड़ खेत में 1000 से लेकर 2500 तक हल्दी की बीजों का प्रयोग किया जाता है

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हल्दी की खेती के लिए सही मौसम का चुनाव “Climate Requirement in turmeric farming”

वैसे हल्दी एक उष्णकटिबंधीय पौधा है पर हल्दी की बुवाई भारत में लगभग हर क्षेत्र में की जा सकती है। हल्दी की बुवाई जून महीने में शुरू होती है । जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है वह अप्रैल-मई की में इसकी बुवाई शुरू कर सकते हैं पर जिन किसानों के पास सिंचाई का पूर्ण साधन नहीं है वह मानसून के शुरू होने पर हल्दी की खेती को शुरू कर सकते हैं ।

हल्दी की खेती के लिए सही खेत का चुनाव

हल्दी की खेती के लिए दोमट तथा रेतीली दोमट मिट्टी सर्वथा उत्तम है।पर हल्दी को लाल मिट्टी से लेकर विभिन्न प्रकार की मिट्टी में उगाया जा सकता है। हल्दी की खेती में जल निकासी का पूर्ण प्रबंध होना चाहिए।

खेत की तैयारी “Land Preparation”

हल्दी जमीन के अंदर उगने वाला पौधा है इसलिए हल्दी की खेती के लिए भूमि को अच्छी तरह से तैयार करने की जरूरत होती है। खेत की मिट्टी अच्छी तरह से भुरभुरी होनी चाहिए खेतों में मिट्टी के ढेलों नाम मात्र को भी ना होने चाहिए।

खाद तथा उर्वरक

हल्दी की खेती में प्राकृतिक खाद ज्यादा फायदेमंद साबित होती है। प्राकृतिक खाद में पालतू पशुओं का गोबर प्रयोग करते हैं। 1 एकड़ खेत में 3 से 4 टन सड़े गोबर की जरूरत पड़ती है। कीटों की रोकथाम के लिए 1 एकड़ में 1 टन नीम की खली या नीम के पत्तों से बनी कीटनाशक का प्रयोग करना चाहिए

हल्दी के फसल के लिए सिंचाई की आवश्यकता

हल्दी में ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता नहीं है लेकिन यदि फसल गर्मी में बुवाई जाती है तो वर्षा प्रारंभ होने के पहले तक चार से पांच सिंचाई की आवश्यकता पड़ती है।

मानसून आने के बाद सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती बीच में वर्षा नहीं होती है सूखा पड़ जाता है तथा अक्टूबर के बाद यदि बारिश नहीं हो पाती है तो ऐसी परिस्थितियों में 20 से 25 दिन के अंतराल पर सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है।

नवंबर माह में पत्तियों का विकास तथा तनो की मोटाई पढ़ना आरंभ हो जाता है तो उस समय उपज ज्यादा प्राप्त करने के लिए मिट्टी चढ़ाना आवश्यक हो जाता है जिससे हल्दी की गांठओं का विकास अच्छा होता है तथा उत्पादन में वृद्धि हो जाती है।

हल्दी की खुदाई

मई-जून में बोई गई फसल फरवरी माह तक परिपक्व हो जाती है । फसल परिपथ हो जाने के बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। हल्दी की कटाई करने के बाद तनो के नीचे की मिट्टी की खुदाई करी जाती है और उसमें से हल्दी को निकाला जाता है।

हल्दी के साथ उगाई जाने वाली मिश्रित फसले

हल्दी को गन्ने, प्याज, लहसुन, मिर्च, और सब्जियों, दालों, मक्का और गेहूं के साथ उगाया जा सकता जाता है इसकी खेती कुछ क्षेत्रों में मिर्च और जल्दी उगने वाली सब्जी के साथ अदरक की सहायक फसलों के रूप में की जाती है।

हल्दी की विकसित किस में

हल्दी की गौतम, सुरुमा, कृष्णा, गुंटूर, पूना, सोनिया शगुन, और सीओ किसमें होती है जिन का चुनाव किसान कर सकते हैं।

खरपतवार वा कीटो का नियंत्रण


हल्दी की फसल में तीन से चार बार निलाई करना पड़ता है। अगर हल्दी के खेतों में कीटों का प्रकोप हो जाता है तो नीम ऑयल नीम से बने कीटनाशक का प्रयोग करना चाहिए । पहली निराई बुवाई 50 से 60 दिनों में करनी चाहिए अगर आवश्यकता पड़े तो इससे पहले भी कर सकते हैं। दूसरी निराई बुवाई एक महीने बाद करनी चाहिए

उत्पादन

1 एकड़ में अच्छी तरह से उगाई गई हल्दी में से 8000 से 10000 किलो तक हल्दी का उत्पादन किया जा सकता है। हल्दी की खेती किसानों की आय बढ़ाने में एक बहुत ही बढ़िया साधन है।

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